वीआईपी रोटी
राहुल … ओ राहुल … आवाज सुन मैं गहरी नींद से चौंक कर जागा। फिर कानों में आवाज पड़ी। राहुल , अब उठ जा ? मैंने देखा तो मेरे कमरे की खिड़की से सूरज झांक रहा था। दरअसल , आज घर में मेहमान आने वाले थे और उनके आने से पहले मां खाना बनाने की तैयारी में जुटी थी। मां सुबह के सभी कामों को निपटा चुकी थी। मैं रोज की तरह देरी से उठा। आंखें मसलते हुए कहा- ‘ आ रहा हूं मां , 2 मिनट रुक जाओ ’ मां बोली- ‘ क्या 2 मिनट रुक जाओ , कोई भी काम कहो। इनके 2 मिनट ही पूर नहीं होते। आज कल के औलादें सुनती ही कहां है। जा बाजार से जाकर सब्जी ले आ , मेहमान आने के बाद सब्जी लेने जाएगा तो अच्छा नहीं लगेगा। मैं जल्दी से आटा गूंथ लेती हूं। ’ ‘ ओफ्फो इतनी सी बात थी क्या , ला देता हूं अभी ’ । तभी मेरी नजर रसोई में पड़ी जहां मां मिट्टी के चूल्हे में पड़ी लकड़ियों के धुएं से बचते हुए फूकणी से बार-बार हवा देते हुए आग जलाने की कोशिश में लगी थी। मैंने देखकर कहा- मां! ‘ ये चूल्हा ही बेकार है , मैं कब से कह रहा हूं कि अपने गैस वाला चूल्हा लेकर आते हैं। उसमें न लकड़ी लगती है और न ही फालतू की मेहनत ’ । मां ने ...