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मार्च, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मिलते रहो....

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  एक चौकीदार ने अपना पूरा जीवन गांव की गलियों में पहरा देते हुए गुज़ारा था। गाँव की मिट्टी की सोंधी खुशबू , नीम के पेड़ के नीचे   चौपाल पर होती हंसी-ठिठोली , और गलियों में बच्चों की धमाचौकड़ी, यह सब उसके लिए घर जैसा था। गाँव में जब वह रात को " जागते रहो! जागते रहो!" की आवाज़ लगाता , तो लोग दरवाजा खोलकर झाँकते , मुस्कुराकर उसका हाल-चाल पूछ लेते। कोई लोटे में पानी पकड़ा देता , तो कोई उसे रात का बचा खाना दे देता। यहां पहरा देना सिर्फ एक नौकरी नहीं , बल्कि अपनापन था। पूरा जीवन गांव को समर्पित करने के बाद करीब 67 वर्ष की उम्र में वह बड़े शहर की एक पॉश सोसाइटी में चौकीदारी करने लगा। यहाँ चौड़ी-चौड़ी सड़कें थीं , ऊंची इमारतें थीं। लोग अपने काम से काम रखते थे और अधिकतर घरों और ऑफिसों में कैद थे , कोई किसी से बात नहीं करता। जब उसने पहली रात सोसाइटी के गेट पर पहरा दिया , तो आदतन ऊँची आवाज़ में बोला— " जागते रहो! जागते रहो!' पर यहाँ कोई दरवाजा नहीं खुला , कोई बाहर झाँकने तक नहीं आया। बस , खिड़कियों से हल्की रोशनी झांक रही थी , जहाँ मोबाइल स्क्रीन की चमक लोगों की आँखों मे...

सुबह की राम राम!

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  राम राम सुबह की ठंडी हवा में हल्की-हल्की धूप फैल रही थी। बच्चे खेल रहे थे, बुजुर्ग टहल रहे थे और कुछ लोग योगासन में लीन थे। मैं और मेरा दोस्त दीपक भदोरिया रोज़ की तरह जंक्शन के डिस्ट्रिक्ट पार्क में अपनी सैर पर थे। इस पार्क में हम सिर्फ टहलते नहीं थे, बल्कि यह हमारी एक आदत भी बन गई थी। कुछ समय दुनिया की भागदौड़ से थोड़ा अलग होने की। मगर इन सबके बीच एक और चीज़ थी, जो रोज़ दोहराई जाती.... एक आदमी का हमें “राम राम!” कहना। इस व्यक्ति की उम्र करीब 55 वर्ष रही होगी। रोजाना अपने 2-3 दोस्तों के साथ वह भी इसी पार्क में टहलने आता था। शुरुआत में तो हमने आदतन जवाब दिया, लेकिन धीरे-धीरे हम इस चीज से चिढ़ने लगे। वह जैसे ही दूर से आता दिखता, हम अपनी चाल धीमी कर लेते, नजरें झुका लेते या फिर दूसरी तरफ मुड़ जाते। कई बार तो हम जानबूझकर किसी पेड़ के पीछे खड़े हो जाते कि कहीं वह हमें देख न ले। हमारे लिए यह एक खेल बन चुका था—“राम राम से बचना!” कभी-कभी मैं कहता कि, "आखिर इस आदमी को हमें राम राम कहने की इतनी क्या जरूरत है?" दीपक कहता, "यार, अगर एक दिन हम राम राम का जवाब न दें तो यह टेंशन में...