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पांच रुपए की भेलपूरी

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  मई की गर्मियों की वो अलसाई दोपहर थीं , जब जेब हल्की होती थीं और सपने भारी। साल 2009 चल रहा था। हम यानि मैं , दीपक और संजू रोज शाम पैदल निकला करते थे। जंक्शन हाउसिंग बोर्ड से बाजार में पुरानी नगरपालिका वाली सड़क तक। यहीं, गली के आख़िर में सोनू भेलपुरी वाला मिलता था। उसका ठेला हमेशा गली के मोड़ पर खड़ा रहता। इस पांच रुपए की भेल में स्वाद , दोस्ती और उम्मीद की पूरी दुनिया होती थी। एक दिन हम भेलपुरी खा रहे थे तभी गली में एक पोस्टर दिखा। इसमें लिखा था एक निजी बैंक को पॉलिसी बेचने वाले लड़कों की ज़रूरत थी। हमारा ध्यान उस पोस्टर पर ज्यादा था। क्योंकि , सैलरी 2 हज़ार रुपए थी। यह हमारे लिए यह किसी ख़ज़ाने से कम नहीं था। बस फिर क्या , हमारी आंखों में बिजली सी दौड़ गई। हमने प्लान बनाने शुरू कर दिए। 1500 रुपए घर पर देंगे , 500 बचाएंगे। धीरे-धीरे पैसे जोड़कर बास्केटबॉल लेंगे , होटल में खाना खाएंगे और फिर बाइक... बाइक! उस वक़्त हमारे लिए बाइक का सपना चांद छूने जैसा था। संजू का सपना थोड़ा ज्यादा महंगा था, क्योंकि उसे बोलेरो गाड़ी लेनी थी। अगले ही दिन हम तीनों इंटरव्यू देने निकल पड़े। इंटरव...

मिलते रहो....

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  एक चौकीदार ने अपना पूरा जीवन गांव की गलियों में पहरा देते हुए गुज़ारा था। गाँव की मिट्टी की सोंधी खुशबू , नीम के पेड़ के नीचे   चौपाल पर होती हंसी-ठिठोली , और गलियों में बच्चों की धमाचौकड़ी, यह सब उसके लिए घर जैसा था। गाँव में जब वह रात को " जागते रहो! जागते रहो!" की आवाज़ लगाता , तो लोग दरवाजा खोलकर झाँकते , मुस्कुराकर उसका हाल-चाल पूछ लेते। कोई लोटे में पानी पकड़ा देता , तो कोई उसे रात का बचा खाना दे देता। यहां पहरा देना सिर्फ एक नौकरी नहीं , बल्कि अपनापन था। पूरा जीवन गांव को समर्पित करने के बाद करीब 67 वर्ष की उम्र में वह बड़े शहर की एक पॉश सोसाइटी में चौकीदारी करने लगा। यहाँ चौड़ी-चौड़ी सड़कें थीं , ऊंची इमारतें थीं। लोग अपने काम से काम रखते थे और अधिकतर घरों और ऑफिसों में कैद थे , कोई किसी से बात नहीं करता। जब उसने पहली रात सोसाइटी के गेट पर पहरा दिया , तो आदतन ऊँची आवाज़ में बोला— " जागते रहो! जागते रहो!' पर यहाँ कोई दरवाजा नहीं खुला , कोई बाहर झाँकने तक नहीं आया। बस , खिड़कियों से हल्की रोशनी झांक रही थी , जहाँ मोबाइल स्क्रीन की चमक लोगों की आँखों मे...

सुबह की राम राम!

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  राम राम सुबह की ठंडी हवा में हल्की-हल्की धूप फैल रही थी। बच्चे खेल रहे थे, बुजुर्ग टहल रहे थे और कुछ लोग योगासन में लीन थे। मैं और मेरा दोस्त दीपक भदोरिया रोज़ की तरह जंक्शन के डिस्ट्रिक्ट पार्क में अपनी सैर पर थे। इस पार्क में हम सिर्फ टहलते नहीं थे, बल्कि यह हमारी एक आदत भी बन गई थी। कुछ समय दुनिया की भागदौड़ से थोड़ा अलग होने की। मगर इन सबके बीच एक और चीज़ थी, जो रोज़ दोहराई जाती.... एक आदमी का हमें “राम राम!” कहना। इस व्यक्ति की उम्र करीब 55 वर्ष रही होगी। रोजाना अपने 2-3 दोस्तों के साथ वह भी इसी पार्क में टहलने आता था। शुरुआत में तो हमने आदतन जवाब दिया, लेकिन धीरे-धीरे हम इस चीज से चिढ़ने लगे। वह जैसे ही दूर से आता दिखता, हम अपनी चाल धीमी कर लेते, नजरें झुका लेते या फिर दूसरी तरफ मुड़ जाते। कई बार तो हम जानबूझकर किसी पेड़ के पीछे खड़े हो जाते कि कहीं वह हमें देख न ले। हमारे लिए यह एक खेल बन चुका था—“राम राम से बचना!” कभी-कभी मैं कहता कि, "आखिर इस आदमी को हमें राम राम कहने की इतनी क्या जरूरत है?" दीपक कहता, "यार, अगर एक दिन हम राम राम का जवाब न दें तो यह टेंशन में...

युवाओं को सुलाना होगा!

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  युवाओं को सुलाना होगा   चुनावी सीजन है और हर तरफ नेताओं की रैलियां चल रही हैं। एक दिन खबर मिली कि एक बहुत बड़े नेता अपनी जनसभा करने जा रहे हैं। वैसे तो मुझे नेताओं की सभा में जाना कभी भी आकर्षक नहीं लगता , लेकिन इस नेता की सोशल मीडिया पर इतनी जबरदस्त फैन फॉलोइंग थी कि मैं सोचने लगा , शायद कुछ नया सुनने को मिले। करोड़ों लोग उसके फॉलोअर हैं , तो ये सभा कुछ अलग ही होनी चाहिए। इस सोच के साथ मैं सभा में पहुंच गया। हालांकि, नेता अपने समय से करीब एक घंटे की देरी से आए। आते ही उन्होंने मुख्य मुद्दों जैसे महंगाई , बेरोजगारी , भ्रष्टाचार, शिक्षा की कमी, स्वास्थ्य सेवा, प्रदूषण के बढ़ते स्तर और क्राइम की बात छोड़कर पाकिस्तान में गरीबी , रूस-यूक्रेन युद्ध , महिलाओं के पहनावे, बॉलीवुड की सारी कथा सुना दी । आधे घंटे तक चली इस सभा में केवल एक ही बात ने मेरा ध्यान खींचा , और वह थी उनका एक बयान: “राष्ट्र निर्माण के लिए युवाओं को जगाना होगा! जाग जाओ हे युवा , अब जागने की बारी है , राष्ट्र के निर्माण की करनी हमें तैयारी है।”   सभा खत्म हुई , और मैं घर की ओर रवाना हो गया। लेकिन...

स्मृति विशेष: रावण का रोल अदा करने वाले ऐसे व्यक्ति, जिनकी एंट्री के बाद मंच के कलाकार भी सहम जाते थे

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श्री भोजराज प्रजापत, मेरे नानाजी ये नाम नई पीढ़ी ने नहीं सुना होगा लेकिन जो व्यक्ति 40 की उम्र पार कर चुके हैं, वे इस नाम और चेहरे को भलीभांति पहचान जाएंगे। टाउन नगरपरिषद रामलीला मंच में 63 वर्षों से चली रामलीला में मेरे नाना ने लंबे समय तक रावण का रोल किया। 10 वर्ष पहले वे इस दुनिया को अलविदा कह गए थे। आज उनकी बात इसलिए करना चाहूंगा क्योंकि आज दशहरे का दिन है और इस दिन मुझे उनकी याद सबसे अधिक आती है। इस दुनिया से तो वे काफी पहले चले गए थे लेकिन, लोग मेरे नाना जी को रावण के रोल के लिए आज भी याद करते हैं। उस दौर के लोगों संग बैठना हुआ तो अचानक उनकी चर्चा चल पड़ी। उन्होंने बताया कि भोजराज जब रावण का रोल करते थे तब उनके अंदर असली रावण की आत्मा आ जाती थी। वेशभूषा, भावभंगिमा और भारीभरकम आवाज उनको रावण का किरदार निभाने के लिए खूब प्रेरित भी करती थी। जब रामलीला मंच पर उनकी एंट्री होती थी तब दर्शकों के साथ साथ उनके साथी कलाकार तक सहम जाते थे। जो कलाकार सीता, राम, लक्ष्मण सहित अन्य रोल निभाते थे वे इस कदर डर जाते थे कि रामलीला के डायरेक्टर को आकर उनको यह समझाना पड़ता था कि फ़िक्र मत करो भोजराज जी स...

वीआईपी रोटी

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  राहुल … ओ राहुल …   आवाज सुन मैं गहरी नींद से चौंक कर जागा। फिर कानों में आवाज पड़ी। राहुल , अब उठ जा‌ ?  मैंने देखा तो मेरे कमरे की खिड़की से सूरज झांक रहा था। दरअसल , आज घर में मेहमान आने वाले थे और उनके आने से पहले मां खाना बनाने की तैयारी में जुटी थी। मां सुबह के सभी कामों को निपटा चुकी थी। मैं रोज की तरह देरी से उठा। आंखें मसलते हुए कहा- ‘ आ रहा हूं मां , 2 मिनट रुक जाओ ’ मां बोली- ‘ क्या 2 मिनट रुक जाओ , कोई भी काम कहो। इनके 2 मिनट ही पूर नहीं होते। आज कल के औलादें सुनती ही कहां है। जा बाजार से जाकर सब्जी ले आ , मेहमान आने के बाद सब्जी लेने जाएगा तो अच्छा नहीं लगेगा। मैं जल्दी से आटा गूंथ लेती हूं। ’ ‘ ओफ्फो इतनी सी बात थी क्या , ला देता हूं अभी ’ । तभी मेरी नजर रसोई में पड़ी जहां मां मिट्टी के चूल्हे में पड़ी लकड़ियों के धुएं से बचते हुए फूकणी से बार-बार हवा देते हुए आग जलाने की कोशिश में लगी थी। मैंने देखकर कहा- मां! ‘ ये चूल्हा ही बेकार है , मैं कब से कह रहा हूं कि अपने गैस वाला चूल्हा लेकर आते हैं। उसमें न लकड़ी लगती है और न ही फालतू की मेहनत ’ । मां ने ...

पहली उड़ान

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ऐसा अक्सर होता है जब चिड़ियों की चहचाहट मेरी नींद में खलल डालकर मुझे  उठा देती है। शाम करीब 4 बजे मुझे ऐसी ही तेज चहचहाहट सुनाई दी, लेकिन इस  बार मैं सोया हुआ नहीं था। यह  चहचहाहट  आमतौर पर सुनी जाने वाली आवाज से  अधिक तेज थी। मुझे लगा घोसले पर अधिकार जमाने के लिए शायद कुछ चिड़िया आपस  में लड़ रही होंगी। इतना सोचा तो मेरी उत्सुकता और बढ़ गई ।  दरअसल, हम भारतीय हैं और अगर कहीं लड़ाई हो रही हो तो चाहे  कितना भी जरूरी काम हो हम रुक कर वह लड़ाई जरूर देखते हैं। इसी तरह मैं भी  बाहर निकलकर उन्हें देखने चला गया। घर से बाहर ही तार पर बैठी दो चिड़िया  (पति-पत्नी) बैठे थे और लगातार ची-ची- ची-ची कर रहे थे। दोनों की नजरे घर  की बालकनी पर थी। मैं थोडा आगे बढ़ा तो देखा 2 छोटी सी चिड़िया बालकनी पर  है। दोनों छोटी सी चिड़िया जरा सा उड़ती और फिर बैठ जाती। उसके माता-पिता  उसके पास आते ची-ची- ची-ची करके कुछ कहते और फिर से तार पर बैठ कर उनके  आने का इंतजार करने लगते। ये दृश्य इतना प्यारा था कि मैं मेरा सारा काम छोड़-छाड़ कर उन्हें ही  देखने बैठ ...