पहली उड़ान


ऐसा अक्सर होता है जब चिड़ियों की चहचाहट मेरी नींद में खलल डालकर मुझे 
उठा देती है। शाम करीब 4 बजे मुझे ऐसी ही तेज चहचहाहट सुनाई दी, लेकिन इस बार मैं सोया हुआ नहीं था। यह चहचहाहट आमतौर पर सुनी जाने वाली आवाज से अधिक तेज थी। मुझे लगा घोसले पर अधिकार जमाने के लिए शायद कुछ चिड़िया आपस में लड़ रही होंगी। इतना सोचा तो मेरी उत्सुकता और बढ़ गई। दरअसल, हम भारतीय हैं और अगर कहीं लड़ाई हो रही हो तो चाहे कितना भी जरूरी काम हो हम रुक कर वह लड़ाई जरूर देखते हैं। इसी तरह मैं भी बाहर निकलकर उन्हें देखने चला गया। घर से बाहर ही तार पर बैठी दो चिड़िया (पति-पत्नी) बैठे थे और लगातार ची-ची- ची-ची कर रहे थे। दोनों की नजरे घर की बालकनी पर थी। मैं थोडा आगे बढ़ा तो देखा 2 छोटी सी चिड़िया बालकनी पर है। दोनों छोटी सी चिड़िया जरा सा उड़ती और फिर बैठ जाती। उसके माता-पिता उसके पास आते ची-ची- ची-ची करके कुछ कहते और फिर से तार पर बैठ कर उनके आने का इंतजार करने लगते।

ये दृश्य इतना प्यारा था कि मैं मेरा सारा काम छोड़-छाड़ कर उन्हें ही देखने बैठ गया। कभी नीचे-कभी ऊपर, कभी किसी घर की छत पर तो कभी पेड़ पर। दोनों चिड़ा -चिड़ी ने अपने बच्चों को उड़ना सिखाने की ट्रेनिंग पूरी शिद्दत के साथ दे रहे थे। मैंने सोचा क्यों न मैं थोड़ी मदद करूं। मैं बालकनी में गया और शू-शू.... करके उसे उड़ाने लगा। छोटी सी चिड़िया थोड़ी सी उड़ी लेकिन तुरंत ही नीचे की तरफ गिर गई। जैसे ही वह नीचे जाने लगी मेरी सांस अटक गई। ये सोचकर कि कहीं इसे मेरी वजह से इस छोटी सी जान को चोट लग गई तो मैं खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाऊंगा। वह संभलते हुए नीचे जाकर घास में बैठ गई।

प्रकृति के काम में इस तरह खलल डालने के लिए मैंने तुरंत ही अपने आप को कोसा और मालूम नहीं क्यों अचानक ही मीशु की तस्वीर मेरे दिमाग में उभर आई। मीशु मेरी पौने दो साल की बेटी है। मुझे उस छोटी सी चिड़िया में मीशु दिखने लगी और उन चिड़ा-चिड़ी के अंदर में और मेरी पत्नी। मुझे याद है जब मीशु चलना सीख रही थी। पूरा परिवार यह सोचता था कब चलेगी, कब चलेगी। मीशु भी चलने की कोशिश करते हुए कई बार गिरी और उठकर फिर से चलने लगती थी। जिस तरह तार पर बैठे वे चिड़ा-चिड़ी बार बार अपने बच्चे के पास जाकर उसको ची-ची- ची-ची करके अपनी भाषा में कुछ समझाते थे। ठीक उसी तरह मैं, मेरी पत्नी और मेरी मां भी मिशु को पा-पा, पा-पा कहकर चलने के लिए प्रेरित करते थे। कोशिश तो हम पूरी करते थे लेकिन वह चलना अपनी मर्जी से ही सीखी।

आखिर वो दिन आया... शाम को हमेशा की तरह हम फर्श पर बैठे बातें कर रहे थे। अचानक मीशु उठी और चलने लगी। अपने आप बिना किसी सहारे के उसे चलता देख सभी के चेहरे अचानक से मुस्कुरा उठे।। बोले... “अरे !! मीशु तो चलने लगी” करीब 10 मिनट तक वह अपने आप चलती रही। गिरने पर खुद से खड़ी होकर फिर से चलने लगती और अपने पैरों में बंधी पायल की आवाज को सुनकर उत्साहित होकर और तेज पैर पटक पटक पर चलने लगती। मैं सोच रहा था बस कर गुड़िया .. वरना थक जाएगी, लेकिन वह नहीं थकी और चलती ही रही। मेरा भी अब ज्यादा रोकने का मन नहीं किया क्योंकि उसकी पहली उड़ान देखकर मैं बेहद उत्साहित था।


खैर... मैं मीशु को चलना सिखाने में खुद का कोई योगदान नहीं मानता। क्योंकि, मैं और मेरी पत्नी जब उसे हाथ पकड़ कर चलना सिखाते थे तो वह आत्मविश्वास के साथ नहीं चलती थी। यह पहली बार था जब वह खुद आत्मविश्वास के साथ छम-छम करते हुए जमीन पर पैर पटक-पटक कर चल रही थी। यह आत्मविश्वास उसके चेहरे पर साफ़ झलक रहा था। खुद को चलता हुआ देख इतराने भी लगी थी। उसकी आंखें मानो किसी हीरे की तरह चमचमा रही थी। उसने अपनी जिंदगी का
पहला इम्तेहान पास कर लिया था। 

यह ख्याल मेरे दिल-दिमाग में दौड़ ही रहे थे कि मैंने देखा वह छोटी सी चिड़िया भी पूरा जोर लगाकर उड़ी और दूर एक उंची ईमारत पर जाकर शान से बैठ गई। दूसरी चिड़िया भी उसके पास आकर बैठ गई। आत्मविश्वास जीत चुका था। छोटी चिड़िया अपना पहला इम्तेहान पास कर चुकी थी। माता पिता की तेज चहचाहट अब मधुर हो गई थी। वे दूर बैठे अपने बच्चों को निहार रहे थे।

राहुल (गरल)

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