युवाओं को सुलाना होगा!
युवाओं को सुलाना होगा
चुनावी सीजन है और हर तरफ नेताओं
की रैलियां चल रही हैं। एक दिन खबर मिली कि एक बहुत बड़े नेता अपनी जनसभा करने जा
रहे हैं। वैसे तो मुझे नेताओं की सभा में जाना कभी भी आकर्षक नहीं लगता, लेकिन इस नेता की सोशल मीडिया पर इतनी जबरदस्त फैन
फॉलोइंग थी कि मैं सोचने लगा, शायद कुछ नया
सुनने को मिले। करोड़ों लोग उसके फॉलोअर हैं, तो ये सभा कुछ अलग ही होनी चाहिए। इस सोच के साथ मैं सभा में पहुंच गया।
हालांकि, नेता अपने समय से करीब एक घंटे की देरी से आए।
आते ही उन्होंने मुख्य मुद्दों जैसे महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, शिक्षा की कमी, स्वास्थ्य सेवा, प्रदूषण के बढ़ते स्तर और
क्राइम की बात छोड़कर पाकिस्तान में गरीबी, रूस-यूक्रेन युद्ध, महिलाओं के पहनावे, बॉलीवुड की सारी कथा सुना दी। आधे घंटे तक चली इस सभा में केवल एक ही
बात ने मेरा ध्यान खींचा, और वह थी उनका एक बयान: “राष्ट्र निर्माण
के लिए युवाओं को जगाना होगा! जाग जाओ हे युवा, अब जागने की
बारी है, राष्ट्र के निर्माण की करनी हमें तैयारी है।”
सभा खत्म हुई, और मैं घर की ओर रवाना हो गया। लेकिन घर पहुंचते-पहुंचते
एक सवाल ने मेरे मन को घेर लिया – युवाओं को जगाना होगा? ... युवाओं को जगाना...? । आखिर, यह कैसे संभव है? क्या इन बड़े-बड़े नेताओं को यह नहीं पता कि हमारे देश के युवा तो सो ही
नहीं रहे हैं! वे तो सोशल मीडिया और मोबाइल के चंगुल में इस कदर फंसे हुए हैं कि
रात-रात भर जागते रहते हैं। ओटीटी प्लेटफार्म्स पर नए सीरियल्स की होड़, एक सीजन को एक ही रात में खत्म करने की ललक, और अब तो कुछ लोग सिर्फ रात को सोने के बजाय सोशल मीडिया
पर रील देख देख कर अंगूठे की कसरत करवाते रहते हैं।
थोड़े ही दिन पहले मैंने एक रिपोर्ट पढ़ी थी। जिसमें यह दावा किया गया था कि भारत के 50 प्रतिशत से
अधिक युवा अपनी नींद ही नहीं पूरी कर रहे हैं। मोबाइल और सोशल मीडिया के कारण
युवाओं की देर रात तक जागने की आदत बन गई है। एक सर्वे के अनुसार युवा वर्ग सोमवार
से शुक्रवार को रात्रि 1 से 2 बजे के बाद ही सोते हैं। वहीं, शनिवार, रविवार को तो सुबह 4 से 5 बजे तक मोबाइल में मूवीज या
गेमिंग करते हैं। यानि, दुनिया की एक पीढ़ी ब्रह्ममुहूर्त में उठने की तैयारी कर रही
होती है. वहीं, ये युवा इसी ब्रह्ममुहूर्त में सोने की तैयारी करते दिखते हैं।
यही वजह है कि युवाओं की
बायोलॉजिकल क्लॉक (जैविक घड़ी) खराब हो चुकी है। स्लीपिंग पैटर्न ही पूरी तरह से
बिगड़ गया है। इसका असर उनकी पढ़ाई और कैरियर पर पड़ रहा है। इसलिए युवाओं को समय
पर सोने के लिए अलग से कोचिंग क्लासेज लेनी पड़ रही है। पहले लोग जागने का अलार्म
लगाते थे लेकिन अब सोने के लिए भी अलार्म लगा रहे हैं।
खैर… नेता लोग तो मुख्य
मुद्दों पर तो वैसे भी बात नहीं करते हैं। इसलिए, कम से कम अब नेताओं को अपने भाषणों में युवा वर्ग को जगाने की नहीं बल्कि
सुलाने की अपील करनी चाहिए। क्योंकि, युवा अगर समय पर सोयेंगे तो बीमारियों से बचे रहेंगे।
अगर बचे रहेंगे तभी तो वे राष्ट्र निर्माण में सहयोग कर सकेंगे। एक स्वस्थ युवा ही अपने देश के लिए कुछ कर सकता है, न कि वो जो पूरी रात जागकर थकान और तनाव से घिरा हो।
राहुल (गरल)
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