मिलते रहो....
एक चौकीदार ने अपना पूरा जीवन गांव
की गलियों में पहरा देते हुए गुज़ारा था। गाँव की मिट्टी की सोंधी खुशबू, नीम के पेड़ के नीचे
चौपाल पर होती हंसी-ठिठोली, और गलियों में बच्चों की धमाचौकड़ी, यह सब उसके लिए घर
जैसा था। गाँव में जब वह रात को "जागते रहो! जागते रहो!" की आवाज़ लगाता, तो लोग दरवाजा खोलकर झाँकते, मुस्कुराकर उसका हाल-चाल पूछ लेते। कोई लोटे में पानी पकड़ा देता, तो कोई उसे रात का बचा खाना दे देता। यहां पहरा देना
सिर्फ एक नौकरी नहीं, बल्कि अपनापन
था।
पूरा जीवन गांव को समर्पित करने
के बाद करीब 67 वर्ष की उम्र में वह बड़े शहर की एक पॉश सोसाइटी में चौकीदारी करने
लगा। यहाँ चौड़ी-चौड़ी सड़कें थीं, ऊंची इमारतें थीं। लोग अपने काम से काम रखते थे और अधिकतर घरों और ऑफिसों
में कैद थे, कोई किसी से बात नहीं करता। जब
उसने पहली रात सोसाइटी के गेट पर पहरा दिया, तो आदतन ऊँची आवाज़ में बोला—
"जागते
रहो! जागते रहो!'
पर यहाँ कोई दरवाजा नहीं खुला, कोई बाहर झाँकने तक नहीं आया। बस, खिड़कियों से हल्की रोशनी झांक रही थी, जहाँ मोबाइल स्क्रीन की चमक लोगों की आँखों में घुली थी।
चौकीदार को बड़ा अजीब लगा। यह कैसा शहर था जहाँ लोग न ठीक से जागते थे, न ठीक से सोते थे—बस मोबाइल की रोशनी में जीते थे और
अपनी ही दुनिया में लीन थे।
कुछ दिन बाद उसने महसूस किया कि इस सोसाइटी में असली खतरा
चोरों से नहीं था, बल्कि अकेलेपन से था। यहाँ किसी
को किसी की परवाह नहीं थी। बच्चे मोबाइल में खोए रहते, बुज़ुर्ग
खिड़की से बाहर देखने के अलावा कुछ नहीं कर सकते थे, और जवान
लोग सुबह ऑफिस जाते, रात को लौटते, और
अपने-अपने घरों में सिमट जाते।
चौकीदार ने सोचा, गाँव में तो वह लोगों
को जागते रहने के लिए कहता था, लेकिन यहाँ लोगों को
आपस में मिलते रहने और बातें करने की जरूरत थी।
एक शाम उसने अपनी छड़ी उठाई, सोसाइटी के गलियारों में घूमने लगा, और ऊँची आवाज़
में बोला—
"मिलते रहो! मिलते रहो!"
कुछ खिड़कियाँ खुलीं, कुछ बालकनियों से लोगों
ने झाँका। किसी ने चश्मा उतारकर देखा, किसी ने फोन से ध्यान
हटाकर सुना।
"अरे ये चौकीदार क्या नया नाटक कर रहा
है?"
कोई हँसा, कोई सिर झटककर अंदर चला
गया।
लेकिन चौकीदार रुका नहीं। अगले दिन फिर वही आवाज़ गूँजी—
"मिलते रहो! मिलते रहो!"
अब लोग थोड़ा चौंकने लगे थे। सोसाइटी का सिक्योरिटी गार्ड
रामू मुस्कुराकर बोला, "काका, अब
कौन सी पहरेदारी कर रहे हो?"
चौकीदार हँसते हुए बोला, "पहले
चोरों से बचाने के लिए ‘जागते रहो' कहता था, अब तन्हाई से बचाने के लिए ‘मिलते रहो' कह रहा
हूँ।"
रामू को बात तो समझ आई, लेकिन बाकी लोग
अब भी इसे मज़ाक ही समझ रहे थे।
एक शाम तेज़ बारिश आ गई। पार्क में घूम रहे कुछ लोग
दौड़कर शेड के नीचे आ गए। वहाँ पहले से ही चौकीदार बैठा था। अब कोई बचकर भाग नहीं
सकता था।
कुछ देर की चुप्पी के बाद, एक आदमी ने
झिझकते हुए पूछा, "काका, आप ये
‘मिलते रहो' क्यों कहते हैं?"
चौकीदार ने मुस्कुराकर कहा—
"क्योंकि, मैं देख रहा हूँ कि तुम सब जाग तो रहे हो,
लेकिन जी नहीं रहे। हर कोई काम में इतना व्यस्त हो गया है कि अपनों
से मिलना ही भूल गया है। अब तो हाल ये है कि एक ही बिल्डिंग में रहने वाले लोग
सालों तक एक-दूसरे से बात नहीं करते।‘
सभी चुप। कोई अपने मोबाइल को देखने लगा, कोई पानी की बूँदों को।
"पहले गाँव में अगर कोई बीमार पड़ता,
तो पूरा मोहल्ला देखने आता था। यहाँ तो पड़ोसी को महीनों तक पता भी
नहीं चलता कि अगला घर खाली क्यों पड़ा है। सोचते हैं कि बाद में मिल लेंगे,
लेकिन वह ‘बाद में' कभी आता ही नहीं।"
अब लोगों के चेहरे बदलने लगे थे। कोई मुस्कुरा दिया, किसी ने सहमति में सिर हिला दिया।
तभी एक महिला बोली, "काका, आप सही कह रहे हैं। मैंने तो अपनी पड़ोसन को पिछले छह महीने से नहीं
देखा।"
दूसरा आदमी बोला, "हम भी सोचते
हैं कि एक दिन बैठेंगे, बातें करेंगे... पर वो एक दिन कभी
आता ही नहीं।"
अब बातचीत शुरू हो गई थी। हँसी के छींटे पहली बार इस
सोसाइटी की हवा में घुलने लगे थे।
उस दिन के बाद, पार्क की बेंच कभी खाली
नहीं रही। लोग वहाँ रोज़ आने लगे। हफ्ते में एक दिन सब मिलकर चाय पीते, किस्से सुनाते। बच्चे फिर से पार्क में खेलने लगे, त्योहारों
में पहले जैसी रौनक लौट आई।
अब हर शाम सोसाइटी में कोई न कोई किसी से कहता—
"मिलते रहो! मिलते रहो!"
चौकीदार की आवाज अब अकेली नहीं थी। यह पूरे मोहल्ले की
धड़कन बन चुकी थी।
राहुल (गरल)

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