सुबह की राम राम!

 


राम राम

सुबह की ठंडी हवा में हल्की-हल्की धूप फैल रही थी। बच्चे खेल रहे थे, बुजुर्ग टहल रहे थे और कुछ लोग योगासन में लीन थे। मैं और मेरा दोस्त दीपक भदोरिया रोज़ की तरह जंक्शन के डिस्ट्रिक्ट पार्क में अपनी सैर पर थे। इस पार्क में हम सिर्फ टहलते नहीं थे, बल्कि यह हमारी एक आदत भी बन गई थी। कुछ समय दुनिया की भागदौड़ से थोड़ा अलग होने की।

मगर इन सबके बीच एक और चीज़ थी, जो रोज़ दोहराई जाती.... एक आदमी का हमें “राम राम!” कहना। इस व्यक्ति की उम्र करीब 55 वर्ष रही होगी। रोजाना अपने 2-3 दोस्तों के साथ वह भी इसी पार्क में टहलने आता था। शुरुआत में तो हमने आदतन जवाब दिया, लेकिन धीरे-धीरे हम इस चीज से चिढ़ने लगे। वह जैसे ही दूर से आता दिखता, हम अपनी चाल धीमी कर लेते, नजरें झुका लेते या फिर दूसरी तरफ मुड़ जाते। कई बार तो हम जानबूझकर किसी पेड़ के पीछे खड़े हो जाते कि कहीं वह हमें देख न ले। हमारे लिए यह एक खेल बन चुका था—“राम राम से बचना!”

कभी-कभी मैं कहता कि, "आखिर इस आदमी को हमें राम राम कहने की इतनी क्या जरूरत है?" दीपक कहता, "यार, अगर एक दिन हम राम राम का जवाब न दें तो यह टेंशन में आ जाएगा? और फिर हम दोनों हंस पड़ते। यह खेल कई दिनों तक चला। मगर एक दिन, हमने महसूस किया कि हम शायद कुछ ग़लत कर रहे हैं। उस व्यक्ति का क्या दोष था? वह तो बस एक साधारण-सा अभिवादन कर रहा था। हमें यह बात अजीब क्यों लग रही थी?

अगली सुबह हमने तय किया कि अब से हम उससे पहले राम राम कहेंगे।

जैसे ही वह दूर से आता दिखा, हमने मुस्कुराते हुए ऊंची आवाज़ में कहा—

“राम राम जी!”

वह कुछ पल के लिए ठिठक गया, फिर उसके चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान लौट आई। उसने सिर हिलाकर कहा, “राम राम जी, राम राम!” और आगे बढ़ गया।

हमने एक-दूसरे को देखा और बिना कुछ कहे मुस्कुरा दिए। उस दिन हमें समझ आया कि शायद समस्या उस व्यक्ति में नहीं थी, बल्कि हममें थी। हम इतने व्यस्त और आत्मकेंद्रित हो गए थे कि हमें किसी अजनबी का प्यार और सम्मान तक असहज करने लगा था। उस दिन महसूस हुआ कि इंसान आज कितना व्यस्त हो गया है। न किसी से बात करने का वक़्त, न किसी से मिलने का। यहां तक कि एक साधारण-सा अभिवादन भी हमारे लिए बोझ बन गया था। मुझे एहसास हुआ कि वह व्यक्ति सिर्फ हमें देख मुस्कुराता था, बस दो शब्द कहता था—राम राम। और हम? हम उसे नजरअंदाज करने लगे थे।


अगले कुछ दिनों तक यही चलता रहा। अब हमें उसका इंतज़ार रहने लगा। वह हमें देखता और हम उसे। राम राम का यह आदान-प्रदान अब केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि एक आदत बन गई थी। एक दिन हम पार्क पहुंचे, लेकिन वह व्यक्ति नहीं आया। हमने सोचा शायद किसी वजह से नहीं आया होगा। मगर दूसरे दिन भी वह नहीं आया। फिर तीसरे दिन भी नहीं।

"आजकल अपना राम राम नहीं दिख रहा, क्या हुआ होगा उसे?" दीपक ने कहा।

"पता नहीं, कहीं बीमार तो नहीं हो गया?" मैंने भी सोचते हुए कहा।

 

हमने तय किया कि आसपास पता करेंगे। पार्क के गार्ड से पूछने पर मालूम पड़ा कि उनका नाम नवीन था, और वे यह शहर छोड़कर ही चले गए थे। उस दिन हमें समझ आया कि ज़िंदगी में छोटी-छोटी चीज़ें भी मायने रखती हैं। हम अक्सर बड़े रिश्तों और बड़ी बातों में उलझे रहते हैं, लेकिन एक साधारण राम राम भी किसी के दिन को रोशन कर सकता है। हम उस व्यक्ति को शायद ठीक से जानते भी नहीं थे, लेकिन उसकी गैरमौजूदगी ने हमें यह सिखा दिया कि इंसान की पहचान सिर्फ नाम या चेहरे से नहीं होती, बल्कि उसके छोटे-छोटे कर्मों से होती है।

अब भी जब हम पार्क में जाते हैं, तो दिल में कहीं न कहीं उसकी कमी महसूस होती है। मगर अब हम हर किसी को खुद से पहले राम राम कहते हैं—शायद, किसी और की सुबह भी वही मुस्कान ला सके, जो कभी उसने हमारे चेहरे पर लाई थी।


राहुल (गरल)

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